जब कभी मैं पटना जंक्शन से गाँधी मैदान या फिर बेली रोड (नेहरू पथ) की चैड़ी सड़कों से गुजरता हूँ, तो दोनों तरफ खड़ी बहुमंजिली इमारतों और पग-पग पर बने चमचमाते शो-रूम को देखकर ऐसा लगता है, मानो वे सदा से ऐसे ही है। इन्हें देख, मुझे बचपन की यादें सपने जैसी लगने लगती है। लेकिन तब पटना आज की तरह भीड़-भाड़ में झोंकाया हुआ नहीं था। न हीं बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ थी, और न कंक्रीट का जंगल हुआ करता था कि गरीबों का धूप और हवा छेंक ले। जगह-जगह आम, अमरूद, पाटलि, अमली, अमलतास आदि के फूल-फलों से आच्छादित पेड़-पौधे दिखते थे। खुले-खुले मैदान और खुली हवा के मदमस्त झोंके। तब शहर में भीड़ का रेलमपेल नहीं था। साइकिल की सवारी आम थी। स्कूटर और फटफटिया कम ही दिखते थे। बजाज का स्कूटर लेने के लिए महीनों पहले लाइन लगती थी। सम्पन्न लोगों के पास ही मोटरकार (एम्बेसडर या फियेट) थी। शहर में जगह-जगह पर टमटम, बग्घी नजर आती थी। पटना में ज्यादातर मकान एक या दो मंजिले होते थे, तीन मंजिले वाले मकान गिने-चुने होते थे। तब राजाबाजार पटना का पश्चिमी किनारा होता था। उसके आगे दोनों तरफ दूर-दूर तक सिर्फ खेत और पेड़-पौधे ही दिखाई पड़ते थे, जहाँ वीराने के कारण कोई भी जाना पसंद नहीं करता था। जब 1980 के दौरान पटना के पश्चिमी बोरिंग कैनाल रोड में हिमगिरी नामक पहली चार या पाँच इमारत बनी थी, तब पटना के लोग आँखें फाड़-फाड़ कर आश्चर्यचकित होकर उसे देखते थे। अब तो पटना में पग-पग पर दस मंजिला या उससे भी ऊँची इमारतें खड़ी है या फिर बन रही है। आज तो स्थिति यह है कि मैं अपने जन्म (1962) से लेकर आज तक यानी 64 वर्ष पटना शहर में बिताकर भी इस शहर को पूरी तरह पहचानने का दावा नहीं कर सकता। कई बार मैं किसी गवेषक की तरह पटना के विभिन्न मुहल्लों के उन परिचित गलियों में खोए स्मृति चिन्हों की तलाश में यहाँ से वहाँ तक भटका हूँ, लेकिन बचपन के उस पटना को दुबारा देख पाना संभव नहीं हुआ। वास्तव में पटना शहर अब बहुत बदल चुका है। लेकिन बचपन से लेकर अब तक की पटना में बीते पल की सारी घटनाएँ स्मृति में धुंधली-धुंधली छाई हुई है- जैसे, आइने पर धूल पड़ गई हो, जैसे तस्वीर के रंग और रेखाओं के समय के थपेड़ों ने धूमिल कर दिया हो। किन्तु शीशे पर एक हल्की फंूक दीजिए, धूल उड़ी, चेहरा चमका। कुछ वैसा ही मुझे महसूस हो रहा है। बचपन से लेकर आज तक का समूचा पटना किसी चलचित्र की भांति मेरी आँखों के सामने तैरने लगा है।
उन दिनों पटना का दुर्गा पूजा बड़ा मशहूर था। दशहरे का इंतजार महीनों पूर्व से ही होने लगता था। दशहरे में सप्तमी से ही हमलोगों का घूमना शुरू हो जाता था। मारूफगंज, अगमकुआँ, पटना जंक्शन, बड़ी पटनदेवी से लेकर छोटी पटनदेवी दोस्तों के साथ रात-रात भर पैदल ही पूजा पंडालों में घूमता रहता था। तब पटना में सांस्कृतिक कार्यकम खूब होते थे, उन्हें देखने जरूर जाता था। उन दिनों देश के जाने माने कलाकार-गायक मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, पद्मा खन्ना, टुनटुन-सब का कार्यक्रम मैंने देखा है। टुनटुन (स्वर्गीय उमा देवी) ने पटना के हार्डिंग पार्क, जो अब शहीद स्मारक बन चुका है, में अपने सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति के दौरान एक गाना गया था, जो मुझे आज तक याद है-“मैं जब से आई पटने, मेरा बदन लगा घटने।
दूर्गा पूजा के बाद होली हमारा पसंदीदा त्योहार हुआ करता था। पटना की शहरी संस्कृति पूरी तरह विकसित नहीं हुई थी। बसंत पंचमी से ही हम बच्चे होली की तैयरियों में जुट जाते थे। होली के दिन तो बस पूछिए ही मत। सुबह में हम बच्चे धुरखेल और कीचड़ की होली खेलते। दोपहर में रंगों की होली। शाम में शहर के हर मुहल्ले में लोग झुंड में फाग गाते, दुआर-दुआर जाते और ढोल-झाल पर फगुआ की तान छेड़ते। फगुआ गाने वाली मंडली कोरस में गाती थी। बच्चे-बूढ़े सभी संकोच भूलकर झाल-ढोलक, झांझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत की तान में डूब जाते थे। उस दिन गाली-गलौज भी हुआ करता था। उसमें बूढ़े, जवान और हम बच्चे एक साथ शामिल होते थे। छोटे-बड़े का लिहाज मिट जाता था। प्रत्येक मंडली का ठेकुआ, गड़ी, छोहाड़ा, अबीर इत्यादि से स्वागत होता था। अब पटना मे होली की वैसी मस्ती खो गई ?
छात्र-जीवन के वे दिन मेरे मुफलिसी के थे। मेरी जेब अक्सर खाली रहती थी। बढ़िया और लजीज खाना तो एक सपना था। वैसे समय में मेरी नजर बारातों पर लगी रहती थी। आसपास के मुहल्लों के किसी घर में शादी के दिन मौजूद अच्छा कपडा पहनकर मैं और मेरे एक-दो मित्र दरवाजा लगने के साथ अक्सर बराती में घुस जाते थे। हम खुद को लड़के वालों की तरफ से आए मेहमान के रूप में प्रत्तुत करते थे। इससे खातिरदारी ज्यादा होती थी और पकड़ाने का डर भी कम रहता था। लेकिन एक बार चूक हो गयी और हम पकड़े गये दरअसल शादी का मौसम था और अदालतगंज मुहल्ले का एक मकान बिजली बत्ती से जगमगा रहा था। खूब चहल-पहल थी। भोज का बढ़िया प्रबंध था। पकवान की खुशबू दूर से ही मिल रही थी। हम बेधड़क प्रवेश कर खाने की मेज पर विराजमान हो गये। उन दिनों टेबुल पर खाना परोसे जाने का रिवाज था। टेबुल पर मेरी बगल में एक बुजुर्ग खाना खा रहे थे। उन्होंने मेचा परिचय पूछा। मैंने हर बार की तरह लड़के वालों की तरफ से आए हुए मेहमान के रूप अपना परिचय दिया। परिचय सुनकर उन्होंने जोरदार ठहाका लगाया। उनका ठहाका सुनकर वहाँ लोग इकट्ठा हो गये। तब मुझझे जानकारी हुई कि वहाँ शादी का भोज नहीं बल्कि किसी वृद्ध व्यक्ति के श्राद्ध कर्म का भोज था। हमारी चोरी पकड़ी गई थी। किसी तरह आरजू-मिन्नत कर हम वहाँ से जान छुड़ाकर भागे। उस दिन के बाद हमने वैसी गलती से तौबा कर ली।
तब मैं मौसा के पटना स्थित यारपुर मुहल्ले में अवस्थित उनके घर में रहता था। उन दिनों नौसा के घर में नियमित रूप से आने वाली नन्दन, चंपक, पराग और चंदामामा जैसी बाल-पत्रिकाएँ मेरे आकर्षक का केन्द्र थीं। उन पत्रिकाओं को बड़े चाव से पढ़ा करता था। उन्हें पढ़ने की ऐसा चाह मुझे लगी कि हर माह बेसब्री से उनका इंतजार रहता था। मौसेरे भाई चन्देश्वर और निर्मल से पहले मैं उन्हें पढ़ डालता। शाम को मैं निकट में ही आर, ब्लॉक स्थित पोस्ट एंड टेलीग्राफ लाइब्रेरी चला जाता। मौसा जी टेलीफोन विभाग में कार्यरत थे। इसीलिए उनके नाम पर मैंने कार्ड बनवा लिया। अब लाइब्रेरी से मनचाही किताबे ला-लाकर से पढ़ने लगा। दिनमान, सारिका, धर्मयुग, महापुरूषों की जीवनी से लेकर पंचतंत्र की कथाएँ सब मैंने पढ़ डाली। ईदगाह, दुश्मन, हार की जीत, दो बैलों की कथा और ऐसी ही कई अन्य बहुचर्चित कहानियों से इसी दौरान मेरा परिचय हुआ।
कुछ वर्षों के बाद मौसाजी किदवईपुरी मुहल्ले में अवस्थित पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ कॉलोनी में शिफ्ट कर गये। यहाँ पास में कोई लाइब्रेरी नहीं थी। लेकिन नुक्कड़ पर पुस्तकों की एक छोटी-सी दुकान थी, जहाँ उस समय के लोकप्रिय उपन्यासकारों, जैसे गुलशन नंदा, प्रेम वाजपेयी, इबने ए सफी, कुशवाहा कान्त आदि के उपन्यास पच्चीस पैसे प्रतिदिन की दर से किराए पर मिलते थे। अपने जेब खर्च को जोड़कर बड़ी मुश्किल से इन किताबों की कीमत अदा कर पाता था। तब अन्य कुछ न मिलने पर इन लेखकों को पढ़कर ही मैंने अपनी साहित्यिक भूख मिटाई।
पटना हाई स्कूल में मैं सांईस का छात्र था। माता-पिता मुझे इंजीनियर बनाना चाहते थे लेकिन विज्ञान में मुझे तनिक भी रूचि नहीं थी। फिजीक्स, केमिस्ट्री, अलजबरा के सूत्रों को याद करना मेरी लिए काफी कठिन था। इन्हीं स्थितियों-परिथितियों के बीच किसी तरह मैट्रिक की परीक्षा मैंने उर्तीण की। तब पटना विश्वविद्यालय का बड़ा क्रेज था। देशभर में उसकी ख्याति थी। वहाँ पढ़ने की मेरी प्रबल इच्छा थी। लेकिन मैट्रिक में कम प्राप्तांक के चलते वहाँ नामांकन नहीं हो सका। मजबूरन मुझे पटना के ए.एन. कॉलेज में नाम लिखाना पड़ा। माता-पिता से जिद करके इस बार मैंने आर्टस में नामांकन कराया। आर्टस की पढ़ाई में मन रमने लगा। कुछ ही महीनों में कॉलेज के मेधावी छात्रों में मेरी गिनती होने लगी। इन्टरमीडियट की परीक्षा मैंने प्रथम श्रेणी में सम्मान के साथ पास की। स्नातक (अर्थशास्त्र सम्मान) की पढ़ाई भी वहीं से प्रथम श्रेणी में उर्तीण की।
स्नातक (अर्थशास्त्र सम्मान) में मिले अच्छे नम्बरों के चलते मेरा नामांकन पटना विश्वविद्यालय में हो गया। मेरा सपना पूरा हुआ। तब केदारनाथ प्रसाद अर्थशास्त्र संकाय के अध्यक्ष थे। जो बाद में पटना विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने। डॉ. नवल किशोर चैधरी जैसे विद्वान वहीं प्राध्यापक थे। वहाँ लेक्चर अंग्रेजी में होते थे। इसीलिए शुरूआती दिनों में मुझे परेशानी हुई। लेकिन बाद में सामान्य होता गया। उन दिनों पटना लॉ कॉलेज में संध्याकालीन पढ़ाई होती थी। मैंने एल.एल.बी में वहाँ नामांकन करा लिया। दिन में एम. ए. और शाम में लॉ की पढ़ाई। पटना लॉ कॉलेज के सामने अंसारी छात्रावास में एक कमरा मिल गया था। वहीं रहने लगा।
आज पटना में पग-पग पर रेस्तरों और बड़े-बड़े होटल खुल गये है। लेकिन तब के पटना में कुछ गिने-चुने होटल ही थे। फुटपाथी होटलों की संख्या ज्यादा थी। तब पटना का डाक बंगला रोड अवस्थित कॉफी हाउस, लेखकों-साहित्यकारों का अड्डा था। रेणु, मधुकर सिंह, दिनकर और नागार्जुन जैसे साहित्यकारों का यहाँ जमावड़ा लगा रहता था। निरामिस खाने के शौकीन लोगों के लिए मछुआटोली में महँगू का होटल बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था, जहाँ लोगों की कतार लगी रहती थी। दूर-दूर से लोग वहाँ खाने-पीने के लिए आते थे।
(अशोक कुमार सिन्हा)

