सोमारू ताली पीट-पीटकर हँस रहा था। एक ही साथ उन्नीस उम्मीदवार चुनाव मैदान में, किसिम-किसिम का चुनाव चिन्ह- चरखा, मशीन, तराजू, आरी, टेलीफोन, चापाकल, कंैची, मुर्गा छाप। इससे भी मजेदार बात यह है कि उसके क्षेत्र में, पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के विरूद्ध चुनाव मैदान में हैं। पति यानी बाबू साहेब का चुनाव चिन्ह है मुर्गा और पत्नी का कैंची। पति के लिए शहर से पाँच हजार टोपीवाले मुर्गे आए हैं। उनके खाने के लिए तरह-तरह के चारे। मुर्गों की बांछें खिल उठीं। वे जोर-जोर से नारे लगाने लगे ‘‘बाबू साहेब जिन्दाबाद। मुर्गा छाप जिन्दाबाद !………………….‘‘
बाबू साहेब की गाड़ी ‘‘वोल्वो एक्स 30‘‘ के दोनों ओर टोपीवाले मुर्गों का कटआउट। बीच में एक टोकरी मुर्गा। बाबू साहेब को भाषण देने की जरूरत नहीं थी। वे तो नवरात्र-व्रत धारण कर चुके थे और माता दुर्गा के सामने पेट पर मुर्गा छाप कलश धारण कर नौ दिनों तक मौन। केवल फलाहार करते थे। दशमी के दिन फड़फड़ा कर उठे। पुष्ट-पुष्ट मुर्गों को साथ लिया और निकल पड़े मतदाताओं को प्रणाम-पाती करने।
मुर्गों ने जिन्दाबाद का नारा लगाया। बाबू साहेब ने पहला चुनावी वक्तव्य दिया, “अभी नवरात्र-व्रत से उठा हूँ और दुर्गा माता के बाद आपसे आशीर्वाद के लिए आया हूँ। समाज मांस-मदिरा, हिंसा और स्त्री-प्रेम से मुक्त हो, इसके लिए आन्दोलन चलाऊँगा। इस बार भी मुझे जीताकर नया कमाल देखिए। मुर्गा खाने की चीज नहीं हैं, चुनाव जीतने की चीज है।”
उल्लासित मुर्गे नारे लगाने लगे- नया बिहार बनाने के लिए मुर्गा-छाप पर बटन दबाईए।
कैंची छाप का जुलूस निकला था। मुर्गों का चिंग्घाड़ सुनते ही पत्नी के तन-मन में आग लग गई। वे बकने लगी, “भइया-बहिनी ! हमारे बिहार को इन्हीं मुर्गा से खतरा है, न ये मुर्गे होते, न आदमी मुर्गा भक्षण करते। आप हमारी ही कैंची से इन मुर्गों की गर्दन काटने के लिए कैंची छाप पर बटन दबाकर मोहिनी देवी को भारी मतों से विजयी बनाइए।”
दम्पति की माइक परस्पर लड़ने लगे- कैंची, मुर्गा-कैंची, मुर्गा।
देश का दुश्मन मुर्गा छाप। मत करना भइया इसको माफ।
मुर्गे, मर्दो का छोड़ों साथ। तभी देश में इनक्लाब।
दूसरी ओर माइक गरजा-ऐसी बेवफा औरत भगाओ भाई। मुर्गा-छाप जिताओ भाई।
मुर्गे जितना उछलते, कार्यकर्ताओं के मुँह से उतनी ही लार टपकती। उनकी लार टोपीवाले मुर्गों पर चू रही थी। उन्हें अचरज हुआ, यह बिन बरसात बूँदा-बूंदी कैसी ? पाँख फड़फड़ाता एक मुर्गा चिल्लाया “यह बूंदा-बूंदी नहीं, मानुष जाति की लार टपक रही है।”
“किसलिए”?
“हम हजमकर जाने के लिए”?
सभी मुर्गों ने उसे मिलकर डांटा- “चुप ? बाबू साहेब इंसान से भी बढ़कर-देवता हैं। ये तो मांस-मदिरा मुक्त समाज निर्माण के लिए चुनाव लड़ रहे हैं, छठी मईया के गीत गा रहे हैं। इनकी जीत के बाद हमारी हत्या बंद हो जाएगी। हमारा सौभाग्य है कि हम बाबू साहेब के चुनाव चिन्ह हैं। जोर-जोर से नारे लगाओ-बाबू साहेब जिन्दाबाद ! मुर्गा-छाप जिन्दाबाद !…………….‘‘
मुर्गे फिर से उत्साह में आ गए। वे गला फाड़कर जोर-जोर से नारे लगाने लगे। बाबू साहेब की बांछें खिल उठीं। जीत अब सुनिश्चित है।
मतदान की पूर्व संध्या पर कार्यकर्ताओं की बैठक चल रही थी। आखिर में कार्यकर्ताओं का प्रस्ताव आया- आज से मुर्गों की जरूरत क्या है ?
बाबू साहेब बोले-क्या चाहते हो तुमलोग ?
र्यकर्ता नारा लगाने लगे-मुर्गा-भात, जिन्दाबाद …………….. !
बाबू साहेब ने अपना निर्णय सुनाया-मोहिनी देवी को भी इसमें शामिल कर लेते हैं। आखिरकार हैं तो मेरी पत्नी ही न ! कल के बाद हमदोनों एक हैं। आज से मुर्गा-कैंची की लड़ाई बंद।
उसी रात दोनों शिविरों में युद्धबंदी का आलम था। रात भर मुर्गा-भात का भोज चलता रहा।
सुबह मतदान कराने के लिए दोनों शिविरों के कार्यकर्ता उत्साहित थे।
(अशोक कुमार सिन्हा)

