इंदिरा गाँधी से जब मैं मिला

जीवन में ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं, जो जीवन की थाती हो जाए और मन–मस्तिष्क को हमेशा सिर्फ गुदगुदाते ही नहीं रहें, बल्कि गौरव का बोध भी कराते रहे। गौरव का बोध कराने वाले जिस संस्मरण को वर्णित करने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा, वह 45 वर्ष पूर्व का है। लेकिन 45 वर्ष पूर्व का वह संस्मरण आज भी इधर–उधर से आकर मेरे मन–प्राण में कस्तूरी गन्ध के समान मादकता बिखेरते रहता है। तब मैं किशोर था। बचपन और जवानी के बीच का यह जीवन सिर्फ विचित्र–विचित्र सपने देखने का ही जीवन नहीं होता, जानने और समझने की उत्सुकताओं का भी होता है। ऐसे ही समय में मेरे पास सशक्त राजनीति और दृढ इरादों के लिए चर्चित रही पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के दर्शन और मिलन की अमूल्य थाती चिर–स्मरणीय हो गई है। जीवन के दराजों में रखी हुई–एकदम संचित, मानो कल की घटना हो ।

1974 के जयप्रकाश–आन्दोलन के परिवेश में मेरा किशोर जीवन पला तथा मूछों की रेखा भी आई। उन दिनों लोकतन्त्र में भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था के खिलाफ जयप्रकाश नारायण ने देशव्यापी आन्दोलन छेड़ रखा था। कभी पुत्री के समान रही भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी उनके राजनीतिक विरोध का प्रतीक बन चुकी थीं। दिनोंदिन जयप्रकाश का नेतृत्व परवान चढ़ रहा था। दूसरी तरफ इंदिरा सरकार का प्रतिरोध और दमन भी जारी था। तब हम बच्चे जोर–शोर से यह कविता पाठ करते थे–

किसी देश में थी एक रानी
बडा चतुर थी बड़ी सयानी
उसका छोरा राज–दुलारा
बिगड गया था लाड़ का मारा…
पढ़ा–लिखा कुछ खास नहीं था
दसवां भी तो पास नहीं था
पढ़ने जब स्कूल गया वह
गुण तो सारे भूल गया वह
याद रहा बस मौज उड़ाना
लड़ना–भिड़ना धौंस जमाना।

मेरे मन–प्राण पर इंदिरा जी की यही स्थापित छवि थी। लेकिन बाद में अकस्मात घटी एक घटना ने उनके प्रति मेरी धारणा बदल कर रख दी। यह धारणा तात्कालिक नहीं रही, समय बोध की नयी मीमांसा में ऐतिहासिक भी मानी जाएगी।

आपातकाल के हटने के बाद 20 मार्च, 1977 को हुए चुनाव में श्रीमती इंदिरा गाँधी को हार का मुँह देखना पड़ा और जयप्रकाश नारायण के प्रयास से बनी जनता पार्टी सतासीन हुई। तब तक जयप्रकाश नारायण की किडनी की तकलीफ बढ़ चुकी थी और उस बीमारी ने अंततः 8 अक्टूबर, 1979 को उन्हें हमसे छीन लिया था। उनके निधन से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई थी। मैं भी मर्माहत था। जयप्रकाश जी के पार्थिव शरीर पर श्रद्धा के फूल चढ़ाने के लिए पक्ष–विपक्ष के तमाम बड़े नेता पटना आए हुए थे। उनमें इंदिरा जी भी एक थीं। लेकिन जयप्रकाश के नहीं होने के दुख की छाया में उनके पटना आगमन पर कोई शोर–शराबा नहीं था। केवल दैनिक अखबारों में उनके आगमन की एक संक्षिप्त सूचना भर थी।

उन दिनों मैं स्नातक प्रथम वर्ष का छात्र था। कॉलेज के एक सहपाठी अवधेश मिश्र से यह जानकारी मिली कि इंदिरा गाँधी और मोरारजी देसाई समेत कई बड़े नेता कल जयप्रकाश जी के दाह–संस्कार में शामिल होने पटना पहुँच रहे हैं। अवधेश ने यह भी जानकारी दी कि इन सभी बड़े नेताओं को राज्य सरकार के अतिथि गृह में ठहराया जाएगा। पटना का एक अण्णे मार्ग स्थित आज का मुख्यमंत्री आवास तब राज्य सरकार का अतिथि–गृह हुआ करता था।

अवधेश ने प्रस्ताव रखा कि कल बांसघाट स्थित दाह–संस्कार स्थल पर भारी भीड उमड़ेगी, इसलिए क्यों न कल सवेरे अतिथि–गृह चलकर हम इन बड़े नेताओं का दर्शन कर लें। इंदिरा गाँधी के प्रति तो मुझे शुरू से ही अप्रीति, अनास्था रही थी, इसलिए उनसे तो नहीं, लेकिन अन्य नेताओं के दर्शन की इच्छा बलवती हो उठी। मैं ‘चलूँगा‘ कहने में सेकेंड की भी देरी नहीं की। आज सोचता हूँ कि कहीं जो उस दिन अवधेश के साथ न गया होता तो जीवन भर उस सुनहरे मौके को खोने का अफसोस रहता।

उस रात ठीक से नींद नहीं आयी। कहीं देर न हो जाए। कहीं भीड़ न बढ़ जाए। कहीं कोई चूक न हो जाए। मन में तरह–तरह के विचार उमड़–घुमड़ रहे थे। इसलिए सुबह–सवेरे ही हम अतिथि–गृह पहुँच गये। अतिथि–गृह में कोई शोर–शराबा नहीं, भीड़ नहीं। माथा ठनका कि दाह–संस्कार में शामिल होने के लिए सभी निकल तो नहीं गए या फिर अतिथि–गृह में ठहरे ही न हो। हम निराश मन से पोर्टिकों के बाहर अपनी साइकिल लगा कर अंदर प्रवेश करते हैं। प्रवेश द्वार पर कोई रोक–टोक नहीं।

दाहिने तरफ के एक कमरे के बाहर दो–तीन आदमी दिख गए, मैं लपका ’’यहाँ कौन–कौन नेता ठहरे है?’’

’’इस कमरा में मोरारजी देसाई और ऊपर के कमरे में इंदिरा गाँधी।’’ उनका संक्षिप्त–सा जवाब था।

दिल को तसल्ली हुई। हमारा आना व्यर्थ नहीं गया। मोरारजी देसाई के कमरा के अन्दर तांक–झांक करते हैं। कमरे में दो–तीन व्यक्ति दिखाई पड़े। तभी मेरी आँखें जमीन पर बिछी चटाई पर बैठकर सूत काटते हुए व्यक्ति पर ठहर गई। एक बार लगा कि मैं गाँधी जी को देख रहा हूँ। वैसा ही कद–काठ का आदमी। आवाज में भी वैसी ही ठनक। ध्यान से देखता हूँ। अरे, यह तो पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई हैं। मैं उनका पांव छूना चाहता हूँ। लेकिन बीच में कई अवरोधों के कारण वह संभव नहीं हो रहा है। इसलिए दूर से ही झुककर उनका अभिवादन करता हूँ। जवाब में उन्होंने आने का प्रयोजन पूछा। हमारे पास उनसे मिलने का तो कोई प्रयोजन था नहीं। इसलिए हमने ‘ऑटोग्राफ’ का बहाना बनाया। मोरारजी देसाई ने हमारी ओर तिर्यक नजरों से देखा और कहा–’’खादी पहनकर आओ, तब ऑटोग्राफ दूँगा।’’

हम बड़ी मुश्किल में पड़ गए। हम दोनों में से किसी के पास खादी के कपडे नहीं थे। कुछ देर यह सोचकर उनके कमरे में खड़ा रहे कि शायद उनका दिल पसीज जाए। चंद मिनटों के बाद उनकी नजरें फिर हमसे टकरायी। हमने अपना अनुरोध पुनः दुहराया। इतना कहना था कि वे आपे से बाहर हो गए–’’कमरा से बाहर निकलो। मैं ऑटोग्राफ नहीं देता।’’ हम तो अयाचित मेहमान थे। हमारे पास और कोई चारा भी नहीं था। इसलिए हम निराश मन से कमरे से निकल पड़े। लेकिन कमरे में प्रवेश करते समय उनके प्रति मन में जो श्रद्धा और आत्मीयता उमड़ रही थी, अप्रीति और अनास्था में तब्दील हो गई थी।

तत्क्षण मन में यह विचार आया कि क्यों न इंदिरा जी से मिल लिया जाए। जो मन इंदिरा गाँधी के प्रति पागलपन की हद तक नफरत का भाव रखता था, आज वहीं इंदिरा गाँधी से मिलने को तत्पर था। अनायास ही मेरे पांव इंदिरा जी के कमरे की तरफ बढ़ गए। बार–बार डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की कविता की यह पंक्ति मन में उच्चरित होती रही–

“मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार, पथ ही मुड़ गया था।”

इंदिरा जी का कमरा बिल्कुल खाली। एक व्यक्ति कमरे के बाहर चहलकदमी कर रहा था। शायद वह उनका निजी स्टाफ था। हम उससे इंदिरा जी से मिला देने की चिरौरी करते हैं। वह बैठने का इशारा कर अन्दर के कमरे में चला जाता है। थोड़ी ही देर में चेहरे पर एक मृदु मुस्कान लिए इंदिरा जी हमारे सामने थीं। हम हड़बड़ा कर सोफा से उठकर उनका अभिवादन करते हैं। प्रत्युत्तर में वे मुस्कुराकर हमें बैठने का इशारा करती हैं। मैं ध्यान से उनके चेहरे पर गौर करता हूँ। गर्वभरी सौम्य–अचंचल, किन्तु शारीरिक तथा मानसिक रूप से पूरी तरह चौकस। फिर उन्होंने बड़े प्यार से हमारा परिचय पूछा। लेकिन आपातकाल की अधिनायिका को सामने देखकर हमारी तो घिग्गी बंध चुकी थी। हकला–हकला कर किसी तरह हमने अपना परिचय दिया।

इंदिरा जी शायद हमारे मनोभावों को समझ चुकी थीं। उन्होंने कहा, “तुमलोग घबड़ाओ नहीं। आराम से बैठो। मैं संजय को भेजती हूँ, उससे बात करो।” फिर उन्होंने अपने स्टाफ से कहा कि इन्हें चाय पिलाकर भेजना और दूसरे कमरे में चली गईं। उनका जाना और संजय गाँधी का आना लगभग साथ–साथ हुआ। संजय गाँधी ने आकर सबसे पहले हाथ मिलाया और फिर हमारी पढ़ाई तथा बिहार की राजनीति के बारे में विस्तार से पूछताछ की। हम जितना जानते थे, बता दिया। तब तक चाय आ चुकी थी। हमने साथ चाय पी। फिर उन्हें प्रणाम करके उनके कमरे से बाहर निकल पड़े।

सीढ़ियों से नीचे उतरते वक्त नीचे हॉल में कुछ लोगों से बातचीत करते जगजीवन राम दिखाई पड़ते हैं। मैं उनके निकट पहुँचकर उन्हें प्रणाम करता हूँ। वे भी बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं और फिर मेरा हालचाल पूछते हैं। मानो, उनसे मेरी वर्षों पुरानी जान-पहचान हो, जबकि मैं पहली बार उनसे मिल रहा था। इससे पूर्व सिर्फ अखबारों में ही उन्हें देखा था।

उस दिन के बाद से 45 वर्ष का एक लंबा अरसा गुजर चुका है। लेकिन आज भी जब उन क्षणों को याद करता हूँ तो भाव विह्वल हो जाता हूँ। वे क्षण मेरी जिन्दगी की संपत्ति बन गए हैं। मैं स्वयं को धन्य मानता हूँ कि मुझे इंदिरा जी, मोरारजी देसाई और जगजीवन राम के दर्शन हुए। इंदिरा गाँधी और जगजीवन राम से तो बातें भी की और उनका स्नेह भी पाया। विशेषकर इंदिरा जी की स्मृति मुझे कभी भुलाये नहीं भूलती। उनकी मृदु मुस्कान वाली छवि मेरे हृदय में अनंत तक घर कर गई है। मैं जब कभी भी उस मुस्कुराते चेहरे को याद करता हूँ, तो मेरी आँखों में आँसुओं की छलछलाहट आ जाती है। राजनीति के शिखर पर आज जो चेहरे दिख रहे हैं, उनसे वे हजार गुना अच्छी थीं। वह व्यक्ति नहीं, लौ थीं– एक ऐसी लौ, जो कभी मद्धिम नहीं होती।

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